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Saturday, June 19, 2021

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|श्री मद्भगवत् गीता के अध्याय 7 का सारांश|Summary of Chapter 7 of Shri Madbhagavad Gita|

श्री मद्भगवत् गीता के अध्याय 7 का सारांश “ इस ज्ञान को जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं ” अध्याय 7 के श्लोक 1 से 5 में कहा है कि अर्जुन जो कोई मेरे ( ब्रह्म ) में पूर्णरूप से आसक्त होकर लगा हुआ है और जिस ज्ञान से मेरा परमभक्त पूर्ण ज्ञान युक्त हो जाएगा । इस ज्ञान से उसे पता लग जाएगा कि कौन कितने पानी में है ।

श्री ब्रह्मा जी , श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी , ब्रह्म , परब्रह्म तथा पूर्णब्रह्म तक की स्थिति से परिचित हो जाएगा तथा पूर्ण सन्त की खोज करके तत् ब्रह्म ( पूर्ण परमात्मा ) की भक्ति की चेष्टा करेगा ।

इस ज्ञान को समझने के उपरान्त फिर जानने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहेगा । वह ज्ञान अब कहूँगा । हजारों साधको में कोई एक प्रभु प्राप्ति करने का यत्न करता है जो मेरे से पूर्ण परिचित है कि मैं वास्तव में काल हूँ । फिर वह साधक जन्म – मत्यु से छूटने की भरसक कोशिश करता है ।

गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्री देवी भागवत महापुराण जिसके सम्पादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार , चिमन लाल गोस्वामी , के पष्ठ 123 पर भी यह प्रमाण है । लिखा है कि भगवान शिव ने दुर्गा ( प्रकति देवी ) की महिमा करते हुए कहा , शिवे ! सम्पूर्ण संसार की सष्टि करने में तुम बड़ी चतुर हो , मात ! पथ्वी , जल , पवन , आकाश , अग्नि , ज्ञानेन्द्रिय , कर्मेन्द्रिय , बुद्धि , मन और अहंकार ये सब तुम्हीं हो । इस संसार की सष्टि , स्थिति और संहार करने में तुम्हारे गुण सदा समर्थ हैं । उन्हीं तीनों गुणों से उत्पन्न हम ( ब्रह्मा , विष्णु , शंकर ) नियमानुसार कार्य करने में तत्पर रहते हैं । ) गीता अध्याय 7 श्लोक 4 से 6 में स्पष्ट किया है कि मेरी आठ प्रकार की माया जो आठ भाग में विभाजित है पाँच तत्व तथा तीन ( मन , बुद्धि , अहंकार ) ये आठ भाग हैं ।यह तो जड़ प्रकति है । सर्व प्राणियों को उत्पन्न करने में सहयोगी हैं , जैसे मन के कारण प्राणी नाना इच्छाएं करता है । इच्छा ही जन्म का कारण है । पाँच तत्वों से स्थूल शरीर बनता है तथा मन , बुद्धि , अहंकार के सहयोग से सूक्ष्म शरीर बना है तथा इससे दूसरी चेतन प्रकति ( दुर्गा ) है ।

यही दुर्गा ( प्रकति ) ही अन्य तीन रूप ( महालक्ष्मी – महासावित्री – महागौरी ) बनाकर काल ब्रह्म के सहयोग से तीनों पुत्रों रजगुण युक्त श्री ब्रह्मा जी , सतगुण युक्त श्री विष्णु जी , तमगुण युक्त श्री शिव जी को उत्पन्न करती है । फिर भूल – भूलईयाँ ( जाल साजी ) करके तीन अन्य स्त्री रूप बनाकर तीनों देवताओं ( श्री ब्रह्मा जी , श्री विष्णु जी , श्री शिव जी ) से विवाह करके काल के जीव उत्पन्न करती है ।

जो चेतन प्रकति ( शेराँवाली ) है । इसके सहयोग से काल सर्व प्राणियों की उत्पत्ति करता है , ( प्रमाण गीता अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में । ) इस अध्याय 7 श्लोक 6-7 में गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म कह रहा है कि मैं सारे संसार के जीवों के प्रलय तथा उत्पत्ति का कारण हूँ । ( क्योंकि काल को एक लाख मानव शरीर धारी प्राणी प्रतिदिन खाने पड़ते हैं ) । सातवें श्लोक में कहा है कि सर्व संसार मेरे ( ब्रह्म ) में जकड़ा है ।

कबीर साहेब जी महाराज कहते हैं कि सुर नर मुनिजन तेतिस करोड़ी । बंधे सब ज्योति निरंजनडोरी ।। ” बल तथा बुद्धि काल के वश ” गीता अध्याय 7 श्लोक 8 से 11 तक ब्रह्म कहता है कि मैं जल का गुण रस हूँ , प्रकाश हूँ तथा वेदों में ( प्रणव ) औंकार ( ऊँ ) हूँ और सर्व तत्व का गुण भी मैं ही हूँ ।

मनुष्यों में श्रेष्ठ हूँ तथा मुझे हीसर्व प्राणियों ( स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर में जीव ) का कारण जान । तेजस्वियों का तेज भी मेरे से ही है । बुद्धिमानों की बुद्धि ( जब चाहे बुद्धि प्रदान कर देता हूँ जब चाहे बुद्धि भ्रष्ट कर देता हूँ ) , तपस्वियों का तप भी मैं ( काल ) ही हूँ । ( चूंकि तपस्वियों को राज देता है वहाँ भी आनन्द मन ( काल ) ही लेता है । ) मैं ( काल ) ही शक्तिशालियों का बल हूँ तथा सब प्राणियों में व्यवस्थित काम ( सैक्स ) हूँ । ( जैसे पहले अर्जुन को बल दे कर योद्धा बना दिया ।

युद्ध जीता , अर्जुन ने बड़े -2 योद्धा मार डाले फिर बल वापिस ले लिया । जब भगवान श्री कष्ण जी का वध एक शिकारी ने कर दिया तो अर्जुन गोपियों (कृष्ण जी की 16000 ( सोलह हजार ) अवैध स्त्रियों ) को लाने द्वारिका गया तो रास्ते में भीलों ने अर्जुन को पीटा तथा गोपियों को लूट ले गए तथा कुछ गोपियों को साथ भी ले गए ।

उस समय काल ब्रह्म ने अर्जुन को बल रहित कर दिया जिसके कारण अर्जुन से गांडिव धनुष भी नहीं चला और काम वासना ( सैक्स ) का भी मन ही आनन्द लेता है । )

दूसरा उदाहरण : – जिस समय लंका पति रावण ने सीता जी का अपहरण कर लिया था । उस समय सीता जी को खोज में श्री राम वन -2 भटक रहे थे । उन्हें पता नहीं था कि उनकी पत्नी सीता जी को कौन उठा गया है ? कहां है ? क्योंकि काल ब्रह्म ने उसकी बुद्धि को बंद कर रखा था । उसी समय पार्वती जी ( पत्नी शिव जी ) सीता जी का रूप धारण करके श्री रामचन्द्र जी की परीक्षा लेने आई तो श्री राम ने पहचान लिया की आप पार्वती हैं ।

उस समय काल ब्रह्म अर्थात् गीता ज्ञान दाता ने श्री रामचन्द्र ( श्री विष्णु ) की बुद्धि खोल दी । इसीलिए यहां श्लोक 10,11 में कहा है कि बलवानों का बल तथा बुद्धिमानों की बुद्धि मेरे हाथ में है । ” तीनों गुणों के पुजारी दुष्कर्मी , राक्षसवती के , मनुष्यों में नीच , मूर्ख हैं ” ” तीनों गुण क्या हैं ? प्रमाण सहित ” तीनों गुण रजगुण ब्रह्मा जी , सतगुण विष्णु जी , तमगुण शिव जी हैं ।

ब्रह्म ( काल ) तथा प्रकति ( दुर्गा ) से उत्पन्न हुए हैं तथा तीनों नाशवान हैं । ” प्रमाण : – गीताप्रैस गोरखपुर से प्रकाशित श्री शिव महापुराण जिसके सम्पादक हैं श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार पष्ठ सं . 110 अध्याय 9 रूद्र संहिता “ इस प्रकार ब्रह्मा – विष्णु तथा शिव तीनों देवताओं में गुण हैं , परन्तु शिव ( ब्रह्म – काल ) गुणातीत कहा गया है ।

दूसरा प्रमाण : – गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद् देवीभागवत पुराण जिसके सम्पादक हैं श्री हनुमान प्रसाद पौद्दार चिमन लाल गोस्वामी , तीसरा स्कंद , अध्याय 5 पष्ठ 123 : – भगवान विष्णु ने दुर्गा की स्तुति की : कहा कि मैं ( विष्णु ) , ब्रह्मा तथा शंकर तुम्हारी कप्या से विद्यमान हैं । हमारा तो आविर्भाव ( जन्म ) तथा तिरोभाव ( मत्यु ) होती है । हम नित्य ( अविनाशी ) नहीं हैं । तुम ही नित्य हो , जगत् जननी हो , प्रकति और सनातनी देवी हो । भगवान शंकर ने कहा : यदि भगवान ब्रह्मा तथा भगवान विष्णु तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाला मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या तुम्हारी संतान नहीं हुआ अर्थात् मुझे भी उत्पन्न करने वाली तुम ही हों । इस संसार की सष्टि – स्थिति – संहार में तुम्हारे गुण सदा सर्वदा हैं । इन्हीं तीनों गुणों से उत्पन्न हम , ब्रह्मा – विष्णु तथा शंकर नियमानुसार कार्य में तत्पर रहते हैं । उपरोक्त यह विवरण केवल हिन्दी में अनुवादित श्री देवीमहापुराण से है , जिसमें कुछ तथ्योंको छुपाया गया है ।

इसलिए यही प्रमाण देखें श्री मद्देवीभागवत महापुराण सभाषटिकम् समहात्यम् , खेमराज श्री कष्ण दास प्रकाश मुम्बई , इसमें संस्कत सहित हिन्दी अनुवाद किया है ।

तीसरा स्कंद अध्याय 4 पष्ठ 10 , श्लोक 42 : ब्रह्मा – अहम् महेश्वरः फिल ते प्रभावात्सर्वे वयं जनि युता न यदा तू नित्याः , के अन्ये सुराः शतमख प्रमुखाः च नित्या नित्या त्वमेव जननी प्रकतिः पुराणा ( 42 ) ।

हिन्दी अनुवाद : – हे मात ! ब्रह्मा , मैं तथा शिव तुम्हारे ही प्रभाव से जन्मवान हैं , नित्य नही हैं अर्थात् हम अविनाशी नहीं हैं , फिर अन्य इन्द्रादि दूसरे देवता किस प्रकार नित्य हो सकते हैं । तुम ही अविनाशी हो , प्रकति तथा सनातनी देवी हो ।

( 42 ) फ्ठ 11-12 , अध्याय 5 , श्लोक 8 : – यदि दयामना न सदाबिके कथमहं विहितः च तमोगुणः कमलजश्च रजोगुणसंभवः सुविहितः किमु सत्वगुणों हरिः

( 8 ) अनुवाद : – भगवान शंकर बोले : हे मात ! यदि हमारे ऊपर आप दयायुक्त हो तो मुझे तमोगुण क्यों बनाया , कमल से उत्पन्न ब्रह्मा को रजोगुण किस लिए बनाया तथा विष्णु को सतगुण क्यों बनाया ? अर्थात् जीवों के जन्म – मत्यु रूपी दुष्कर्म में क्यों लगाया ?

श्लोक 12 : – रमयसे स्वपतिं पुरुषं सदा तव गतिं न हि विह विद्म शिवे ( 12 ) हिन्दी – अपने पति पुरुष अर्थात् काल भगवान के साथ सदा भोग – विलास करती रहती हो । आपकी गति कोई नहीं जानता ।

तीसरा स्कंद पष्ठ 14 , अध्याय 5 श्लोक 43 : – एकमेवा द्वितीयं यत् ब्रह्म वेदा वदंति वै । सा किं त्वम् वाप्यसौ वा किं संदेहं विनिवर्तय ( 43 )

अनुवाद : – जो कि वेदों में अद्वितीय केवल एक पूर्ण ब्रह्म कहा है क्या वह आप ही हैं या कोई और है ? मेरी इस शंका का निवार्ण करें ।

ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर देवी ने कहा देव्युवाच सदैकत्वं न भेदोस्ति सर्वदैव ममास्य च ।। योसौ साहमहं योसौ भेदोस्ति मतिविभ्रमात्।।2 ।। आवयोरंतरं सूक्ष्म यो वेद मतिमान्हि सः ।। विमुक्तः स तू संसारान्मुच्यते नात्र संश्यः।।3 ।।

अनुवाद – यह है सो मैं हूं , जो मैं हूं सो यह है , मति के विभ्रम होनेसे भेद भासता है । 2 ।। हम दोनों का जो सूक्ष्म अन्तर है इसको जो जानता है वही मतिमान अर्थात् तत्वदर्शी है , वह संसार से पथक् होकर मुक्त होता है , इसमें संदेह नहीं ।।

3 ।। सुमरणाद्दर्शनं तुभ्यं दास्येहं विषमे स्थिते ।। स्वर्तव्याहं सदा देवाः परमात्मा सनातनः ।। 80 ।। उभयोः सुमरणादेव कार्यसिद्धिर संश्यम् || ब्रह्मोवाच।।इत्युक्त्वा विससस्मिान्द त्वा शक्ती : सुसंस्कतान् ।। 81 ।। विष्णवेथ महालक्ष्मी महाकालीं शिवाय च ।। महासरस्वती मां स्थानात्तस्माद्विसर्जिताः ।| 82 ||

अनुवाद – संकट उपस्थित होने पर सुमरण से ही मैं तुमको दर्शन दूंगी , देवताओं ! परमात्मा सनातन देवकी शक्तिरूपसे मेरा सदा सुमरण करना । 180 || दोनों के सुमरण से अवश्य कार्यसिद्धि होगी , ब्रह्माजी बोले इस प्रकार संस्कार कर शक्ति देकर हमको विदा किया । 81 ।। विष्णु के निमित्त महालक्ष्मी , शिव के निमित्त महाकाली , और हमको महासरस्वती देकर विदा किया ।

82 ।।मम चैव शरीरं वै सूत्रमित्याभिधीयते ।। स्थूलं शरीरं वक्ष्यामि ब्रह्मणः परमात्मनः ।|83 ।।

अनुवाद – मेरा शरीर सूत्ररूप कहा जाता है , परमात्मा ब्रह्म का स्थूलशरीर कहाता है । 183 ।। ।। ब्रह्मा , विष्णु , शिव ( त्रिगुण माया ) जीव को मुक्त नहीं होने देते ।।

गीता अध्याय 7 श्लोक 12 : तीनों गुणों से जो कुछ हो रहा है वह मुझ से ही हुआ जान । जैसे रजगुण ( ब्रह्मा ) से उत्पत्ति , सतगुण ( विष्णु ) से संस्कार अनुसार पालन – पोषण स्थिति तथा तमगुण ( शिव ) से प्रलय ( संहार ) का कारण काल भगवान ही है । फिर कहा है कि मैं इन में नहीं हूँ । क्योंकि काल बहुत दूर ( इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में निज लोक में रहता है ) है परंतु मन रूप में मौज काल ही मनाता है तथा रिमोट से सर्व प्राणियों तथा ब्रह्मा जी , श्री विष्णु जी व श्री शिव जी को यन्त्र की तरह चलाता है ।

पवित्र गीता जी के अ . 7 श्लोक 1 से 11 में काल ब्रह्म ने कहा है कि अर्जुन ! अब तुझे वह ज्ञान सुनाऊँगा जिसके जानने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता । गीता बोलने वाला काल ब्रह्म कह रहा है कि मेरे इक्कीस ब्रह्मण्ड़ों के प्राणियों के लिए मेरी पूजा से ही शास्त्र अनुकूल साधना प्रारम्भ होती है , जो वेदों में वर्णित है । मेरे अन्तर्गत जितने प्राणी हैं उनकी बुद्धि मेरे हाथ में है । मैं केवल इक्कीस ब्रह्मण्ड़ों में ही मालिक हूँ ।

इसलिए ( गीता अ .7 श्लोक 12 से 15 तक ) जो भी तीनों गुणों से ( रजगुण – ब्रह्मा से जीवों की उत्पत्ति , सतगुण – विष्णु जी से स्थिति तथा तमगुण – शिव जी से संहार ) जो कुछ भी हो रहा है उसका मुख्य कारण मैं ( ब्रह्म काल ) ही हूँ । ( क्योंकि काल को एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के शरीर को मार कर मैल को खाने का शाप लगा है ) जो साधक मेरी ( ब्रह्म की ) साधना न करके त्रिगुणमयी माया ( रजगुण – ब्रह्मा जी , सतगुण – विष्णु जी , तमगुण – शिव जी ) की साधना करके क्षणिक लाभ प्राप्त करते हैं , जिससे ज्यादा कष्ट उठाते रहते हैं , साथ में संकेत किया है कि इनसे ज्यादा लाभ मैं ( ब्रह्म काल ) दे सकता हूँ , परन्तु ये मूर्ख साधक तत्वज्ञान के अभाव से इस त्रिगुण माया अर्थात् इन्हीं तीनों गुणों ( रजगुण – ब्रह्मा जी , सतगुण – विष्णु जी , तमगुण – शिव जी ) तक की साधना करते रहते हैं ।

इनकी बुद्धि इन्हीं तीनों प्रभुओं तक सीमित है । इसलिए ये राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए , मनुष्यों में नीच , दुष्कर्म करनेवाले , मूर्ख मुझे ( ब्रह्म को नहीं भजते । यही प्रमाण गीता अध्याय 16 श्लोक 4 से 20 व 23,24 तक अध्याय 17 श्लोक 2 से 14 तथा 19 व 20 में भी है । यही प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 20 से 23 में है ।

विचार करें : – रावण ने भगवान शिव जी को मत्युंजय , अजर – अमर , सर्वेश्वर मान कर भक्ति की , दस बार शीश काट कर समर्पित कर दिया , जिसके बदले में युद्ध के दौरान दस शीश रावण को प्राप्त हुए , परन्तु मुक्ति नहीं हुई , राक्षस कहलाया ।

यह दोष रावण के गुरुदेव का है जिस नादान ( नीम – हकीम ) ने वेदों को ठीक से न समझ कर अपनी सोच से तमोगुण युक्त भगवान शिव को ही पूर्ण परमात्मा बताया तथा भोली आत्मा रावण ने झूठे गुरुदेव पर विश्वास करके जीवन व अपने कुल का नाश किया । एक भस्मागिरी नाम का साधक था , जिसने शिव जी ( तमोगुण ) को ही इष्ट मान कर शीर्षासन ( ऊपर को पैर नीचे को शीश ) करके 12 वर्ष तक साधना की , वचन बद्ध करके भस्मकण्डा ले लिया ।

भगवान शिव जी को ही मारने लगा । उद्देश्य यह था कि भस्मकण्डा प्राप्त करके भगवान शिव जी को मार कर पार्वती जी को पत्नी बनाऊँगा । भगवान श्री शिव जी डर के मारे भाग गए , फिर विष्णु जी ने उस भस्मासुर को गंडहथ नाच नचा कर उसी भस्मकण्डे से भरम किया । वह शिव जी ( तमोगुण ) का साधक राक्षस कहलाया ।

हरिण्यकशिपु ने भगवान ब्रह्मा जी ( रजोगुण ) की साधना की तथा राक्षस कहलाया । एक समय आज ( सन् 2006 ) से लगभग 325 वर्ष पूर्व हरिद्वार में हर की पैड़ियों पर ( शास्त्र विधि रहित साधना करने वालों के ) कुम्भ पर्व की प्रभी का संयोग हुआ । वहाँ पर सर्व ( त्रिगुण उपासक ) महात्मा जन स्नानार्थ पहुँचे । गिरी , पुरी , नाथ , नागा आदि भगवान श्री शिव जी ( तमोगुण ) के उपासक तथा वैष्णों भगवान श्री विष्णु जी ( सतोगुण ) के उपासक हैं । गंगा नदी में प्रभी के समय प्रथम स्नान करने के हठ के कारण नागा तथा वैष्णों साधुओं में घोर युद्ध हो गया ।

लगभग 25000 ( पच्चीस हजार ) त्रिगुण उपासक मत्यु को प्राप्त हुए । जो व्यक्ति जरा – सी बात पर कत्ले आम कर देता है वह साधु है या राक्षस स्वयं विचार करें । आम व्यक्ति भी कहीं स्नान कर रहे हों और कोई व्यक्ति आ कर कहे कि मुझे भी कुछ स्थान स्नान के लिए देने की कप्या करें । शिष्टाचार के नाते कहते हैं कि आओ आप भी स्नान कर लो । इधर – उधर हो कर आने वाले को स्थान दे देते हैं ।

इसलिए पवित्र गीता जी अध्याय 7 श्लोक 15 में कहा है कि जिनका मेरी त्रिगुणमई माया ( रजगुण – ब्रह्मा जी , सतगुण – विष्णु जी , तमगुण – शिव जी ) की पूजा के द्वारा ज्ञान हरा जा चुका है , वे केवल मान बड़ाई के भूखे राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए , मनुष्यों में नीच अर्थात् आम व्यक्ति से भी पतित स्वभाव वाले , दुष्कर्म करने वाले मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते ।

गीता अध्याय 7 श्लोक 16 से 18 तक पवित्र गीता जी के बोलने वाला ( ब्रह्म ) प्रभु कह रहा है कि मेरी भक्ति ( ब्रह्म साधना ) भी चार प्रकार के साधक करते हैं । एक तो अर्थार्थी ( धन लाभ चाहने वाले ) जो वेद मंत्रों से ही जंत्र – मंत्र , हवन आदि करते रहते हैं । दूसरे आर्त ( संकट निवार्ण के लिए वेदों के मंत्रों का जन्त्र – मंत्र हवन आदि करते रहते हैं ) तीसरे जिज्ञासु जो परमात्मा के ज्ञान को जानने की इच्छा रखने वाले केवल ज्ञान संग्रह करके वक्ता बन जाते हैं तथा दूसरों में ज्ञान श्रेष्ठता के आधार पर उत्तम बन कर ज्ञानवान बनकर अभिमानवश भक्ति हीन हो जाते हैं , चौथे ज्ञानी हैं ये वे साधक जिनको यह ज्ञान हो गया कि मानव शरीर बार – बार नहीं मिलता , प्रभु साधना नहीं बन पाई तो जीवन व्यर्थ हो जाएगा ।

फिर वेदों को पढ़ा , जिनसे ज्ञान हुआ कि ( ब्रह्मा – विष्णु – शिवजी ) तीनों गुणों व ब्रह्म ( क्षर पुरुष ) तथा परब्रह्म ( अक्षर पुरुष ) से ऊपर पूर्ण ब्रह्म की ही भक्ति करनी चाहिए , अन्य देवताओं की नहीं । उन ज्ञानी उदार आत्माओं को मैं अच्छा लगता हूँ तथा मुझे वे इसलिए अच्छे लगते हैं कि वे तीनों गुणों ( रजगुण ब्रह्मा , सतगुण विष्णु , तमगुण शिवजी ) से ऊपर उठ कर मेरी ( ब्रह्म ) साधना तो करने लगे जो अन्य देवताओं से अच्छी है परन्तु वेदों में ‘ ओ ३ म् ‘ नाम जो केवल ब्रह्म की साधना का मंत्र है

उसी को आप ही विचार – विमर्श करके पूर्ण ब्रह्म का मंत्र जान कर वर्षों तक साधना करते रहे । प्रभु प्राप्ति हुई नहीं । अन्य सिद्धियाँ प्राप्त हो गई । क्योंकि पवित्र गीता अध्याय 4 श्लोक 34 तथा पवित्र यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 10 व 13 में वर्णित तत्वदर्शी संत नहीं मिला , जो पूर्ण ब्रह्म की साधना तीन मंत्र से बताता है , इसलिए ज्ञानी भी ब्रह्म काल साधना करके जन्म – मत्यु के चक्र में ही रह गए ।

इसलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में गीता ज्ञान दाता ने अपनी गति को भी अनुत्तम कहा है । एक ज्ञानी उदारात्मा महर्षि चुणक जी ने वेदों को पढ़ा तथा एक पूर्ण प्रभु की भक्ति का मंत्र ओ ३ म् जान कर इसी नाम के जाप से वर्षों तक साधना की ।

एक मानधाता चक्रवर्ती राजा था ।( चक्रवर्ती राजा उसे कहते हैं जिसका पूरी पथ्वी पर शासन हो । ) उसने अपने अन्तर्गत राजाओं को युद्ध के लिए ललकारा , एक घोड़े के गले में पत्र बांध कर सारे राज्य में घुमाया । शर्त थी कि जिसे राजा मानधाता की आधीनता स्वीकार नहीं है वह इस घोड़े को पकड़ कर बांध ले तथा युद्ध के लिए तैयार रहे ।

किसी ने घोड़ा नहीं पकड़ा । महर्षि चुणक जी को इस बात का पता चला कि राजा बहुत अभिमानी हो गया है । कहा कि मैं इस राजा के युद्ध को स्वीकार करता हूँ युद्ध शुरू हुआ । मानधाता राजा के पास 72 करोड़ सेना थी । उसके चार भाग करके एक – एक भाग ( 18 करोड़ ) सेना से चार बार महर्षि चुणक पर आक्रमण कर दिया । दूसरी ओर महर्षि चुणक जी ने अपनी साधना की कमाई से चार पूतलियाँ ( बम्ब ) बनाई तथा राजा की चारों भाग सेना का विनाश कर दिया ।

विशेष : – श्री ब्रह्मा जी , श्री विष्णु जी , श्री शिव जी तथा ब्रह्म व परब्रह्म की भक्ति से पाप तथा पुण्य दोनों का फल भोगना पड़ता है , पुण्य स्वर्ग में तथा पाप नरक में व चौरासी लाख प्राणियों के शरीर में भिन्न -2 यातनाएं भोगनी पड़ती हैं । जैसे ज्ञानी आत्मा श्री चुणक जी ने जो ओ ३ म् नाम के जाप की कमाई की उससे कुछ तो सिद्धि शक्ति ( चार पुतलियाँ बनाकर ) में समाप्त कर दिया जिससे भोले व्यक्तियों में महर्षि कहलाया ।

कुछ साधना फल को महास्वर्ग में भोग कर फिर नरक में जाएगा तथा फिर चौरासी लाख प्राणियों के शरीर धारण करके कष्ट पर कष्ट सहन करेगा । जो 72 करोड़ प्राणियों ( सैनिकों ) का संहार वचन से तैयार की गई पुतलियों से किया था , उसका भोग भी भोगना होगा । चाहे कोई हथियार से हत्या करे , चाहे वचन रूपी तलवार से उन दोनों को समान दण्ड प्रभु देता है । जब उस महर्षि चुणक जी का जीव कुत्ते के शरीर में होगा उसके सिर में जख्म होगा , उसमें कीड़े बनकर उन सैनिकों के जीव अपना प्रतिशोध लेंगे । कभी टांग टूटेगी , कभी पिछले पैरों से अर्धग हो कर केवल अगले पैरों से घिसड़ कर चलेगा तथा गर्मी – सर्दी का कष्ट असहनीय पीड़ा नाना प्रकार से भोगनी ही पड़ेगी

इसलिए पवित्र गीता जी बोलने वाला ब्रह्म ( काल ) गीता अ .7 श्लोक 18 में स्वयं कह रहा है कि ये सर्व ज्ञानी आत्माएं हैं तो उदार ( नेक ) । परन्तु पूर्ण परमात्मा की तीन मंत्र की वास्तविक साधना बताने वाला तत्वदर्शी सन्त न मिलने के कारण ये सब मेरी ही ( अनुत्तमाम् ) अति अश्रेष्ठ मुक्ति ( गती ) की आस में ही आश्रित रहे अर्थात् मेरी साधना भी अश्रेष्ठ है ।

इसलिए पवित्र गीता जी अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि हे अर्जुन ! तू सर्व भाव से उस पूर्ण परमात्मा की शरण में चला जा । जिसकी कप्या से ही तू परम शान्ति तथा सनातन परम धाम ( सत्यलोक ) को प्राप्त होगा । पवित्र गीता जी को श्री कष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके काल ब्रह्म ने बोला , फिर कई वर्षों उपरांत पवित्र गीता जी तथा पवित्र चारों वेदों को महर्षि व्यास जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश करके काल ब्रह्म ( क्षर पुरुष ) द्वारा लिपिबद्ध किए हैं ।

इनमें परमात्मा कैसा है , कैसे उसकी भक्ति करनी है तथा क्या उपलब्धि होगी , ज्ञान तो पूर्ण है परन्तु सांकेतिक है तथा पूजा की विधि केवल ब्रह्म ( क्षर पुरुष ) अर्थात् ज्योति निरंजन तक की ही है । पूर्ण ब्रह्म की भक्ति के लिए पवित्र गीता अ . 4 श्लोक 34 में पवित्र गीता बोलने वाला ( ब्रह्म ) प्रभु स्वयं कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति व प्राप्ति के लिए किसी तत्वज्ञानी सन्त की खोज कर फिर जैसे वह विधि बताएं वैसे कर । पवित्र गीता जी को बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा का पूर्ण ज्ञान व भक्ति विधि मैं नहीं जानता । अपनी साधना के बारे में गीता अ . 8 के श्लोक21, 13 में कहा है कि मेरी भक्ति का तो केवल एक ‘ ओ ३ म् ‘ ( ओं ) अक्षर है जिसका उच्चारण करके अन्तिम स्वांस ( त्यजन् देहम् ) तक जाप करने से मेरी वाली परमगति को प्राप्त होगा ।

फिर गीता अ . 7 श्लोक 18 में कहा है कि जिन प्रभु चाहने वाली आत्माओं को तत्वदर्शी सन्त नहीं मिला जो पूर्ण ब्रह्म की साधना जानता हो , इसलिए वे उदारात्माएँ मेरे वाली ( अनुत्तमाम् ) अति अनुत्तम परमगति में ही आश्रित हैं । ( पवित्र गीता जी बोलने वाला प्रभु स्वयं कह रहा है कि मेरी साधना से होने वाली गति अर्थात् मुक्ति भी अति अश्रेष्ठ है । )

गीता अ . 15 श्लोक 1 से 4 तक में कहा है

कि यह उल्टा लटका हुआ संसार रूपी वक्ष है , जिसकी मूल ( जड़ें ) तो पूर्ण ब्रह्म अर्थात् आदि पुरुष परमेश्वर है तथा नीचे तीनों गुण ( रजगुण – ब्रह्मा जी , सतगुण – विष्णु जी , तमगुण – शिव जी ) रूपी शाखाएं हैं । इस सष्टि रचना के पूर्ण ज्ञान को ( श्री कष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश ब्रह्म कह रहा है कि ) मैं नहीं जानता । इसलिए यहाँ विचार काल में अर्थात् इस गीता संवाद में मुझे पूर्ण जानकारी नहीं है ।

जो संत उपरोक्त संसार रूपी वक्ष अर्थात् सष्टि की रचना के विषय का पूर्ण ज्ञानी होगा , वह मूल , तना , डार तथा टहनियों का भिन्न – भिन्न वर्णन करेगा उसे ( वेदवित् ) तत्वदर्शी जानना । फिर उस पूर्ण ज्ञानी ( तत्वदर्शी ) सन्त से उपदेश लेकर परमेश्वर के उस परम पद को भली प्रकार खोजना चाहिए । जहाँ जाने के उपरान्त लौटकर संसार में नहीं आते भावार्थ है कि साधकों की जन्म – मत्यु कभी नहीं होती अर्थात् अनादि मोक्ष प्राप्त होता है तथा मैं ( गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है ) भी उसी आदि परम पुरुष परमेश्वर की शरण ( आधीन ) हूँ

इसलिए दढ़ विश्वास के साथ उसी पूर्ण परमात्मा ( सतपुरुष ) का ही सुमरण करना चाहिए ।

पवित्र गीता अ .4 25 तथा 9 में गीता बोलने वाला प्रभु ( ब्रह्म ) कह रहा है कि हे अर्जुन ! मेरे तथा तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं ।

गीता अध्याय 2 श्लोक 12 में यही प्रमाण है कहा है कि हे अर्जुन ! तू मैं तथा यह सर्व सैनिक पहले भी जन्में थे , आगे भी जन्मेंगें ।

गीता अध्याय 10 श्लोक 2 में भी गीता ज्ञान दाता के जन्म का प्रमाण है कहा है कि मेरे जन्म को ऋषि व देवता नहीं जानते क्योंकि वे सब मेरे से उत्पन्न हुए हैं । इससे सिद्ध है कि गीता ज्ञान दाता का जन्म तो हुआ है । जिसे उसकी सन्तान नहीं जानती । पिता की उत्पति को दादा जी बताते हैं । ( कप्या पढ़ें इसी पुस्तक में ‘ सष्टि रचना ‘ ) इससे स्पष्ट है कि ब्रह्म भी नाशवान प्रभु ( क्षर पुरुष ) है ।

इसलिए गीता अ . 15 श्लोक 16 में तीन प्रभुओं की भिन्न – भिन्न व्याख्या है – दो प्रभु , हैं क्षर पुरुष ( नाशवान भगवान अर्थात् ब्रह्म ) तथा अक्षर पुरुष ( अविनाशी प्रभु अर्थात् अक्षर ब्रह्म ) हैं ,

गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा है परन्तु वास्तव में अविनाशी तो इन दोनों से अन्य प्रभु है जो वास्तव में अविनाशी परमात्मा परमेश्वर कहलाता है । जैसे एक मिट्टी का सफेद प्याला जो बिल्कुल अस्थाई है , ऐसे ब्रह्म ( क्षर पुरुष ) तथा इसके इक्कीस ब्रह्मण्डों के प्राणी नाशवान हैं । दूसरा प्याला इस्पात ( स्टील ) का है । इस्पात को भी जंग लगता है और विनाश हो जाता है । सफेद मिट्टी के प्याले की तुलना में इस्पात का प्याला अधिक स्थाई है परन्तु है नाशवान इसलिए इतना अविनाशी इस्पात ( स्टील ) का प्याला है ऐसे अक्षर पुरुष ( परब्रह्म ) तथा इसके सात संख ब्रह्मण्डों के प्राणी अविनाशी जैसे लगते हुए भी नाशवान हैं अर्थात् वास्तव में अविनाशी नहीं हैं । तीसरा प्याला स्वर्ण ( गोल्ड ) का है जो वास्तव में अविनाशी धातु से बना है । जिसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता । ऐसे पूर्ण ब्रह्म ( परम अक्षर पुरुष ) तथा उसके असंख ब्रह्मण्डों में रहने वाले हंसात्माएं ( देवा ) वास्तव में अविनाशी हैं तथा वही तीनों लोकों में प्रवेशकरके सर्व का पालन – पोषण करता है । कविर्देव अर्थात् कबीर प्रभु ने अपने द्वारा रची सष्टि को स्वयं बताया है ।

कबीर अक्षर पुरुष एक पेड़ है , ज्योति निरंजन वाकी डार । तीनों देवा शाखा हैं , पात रूप संसार ।।

अक्षर पुरुष ( परब्रह्म ) तो उलटे लटके पेड़ का तना है तथा मोटी डार ज्योति निरंजन ( क्षर पुरुष अर्थात् ब्रह्म ) है तथा उस डार से आगे तीनों शाखाएं तीनों गुण ( रजगुण – ब्रह्मा जी , सतगुण – विष्णु जी , तमगुण – शिव जी ) हैं । परन्तु मूल ( जड़ ) पूर्ण पुरुष ( परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् सतपुरुष ) है । पेड़ को जड़ ( मूल ) से अर्थात् पूर्ण ब्रह्म से आहार प्राप्त होता है । इसलिए कुल का पालनहार वही परम अक्षर ब्रह्म है जिसका प्रमाण गीता अ . 8 के श्लोक 1 व 3 में दिया है ।

अर्जुन ने पूछा – हे प्रभु ! वह तत् ब्रह्म कौन है , जिसके विषय में आपने गीता अ .7 श्लोक 29 में कहा कि तत्ब्रह्म ( उस पूर्ण परमात्मा ) को तथा पूरे अध्यात्म ज्ञान ( तत्वज्ञान ) को जानने के बाद तो साधक जरा – मरण से छूटने का ही प्रयत्न करता है ।

पवित्र गीता बोलने वाले ( ब्रह्म ) ने गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में उत्तर दिया कि वह परम अक्षर ब्रह्म ( पूर्ण ब्रह्म ) है । गीता अ . 8 श्लोक 6 , में कहा है कि यह विधान है कि अन्त समय में जो साधक जिस भी प्रभु ( ब्रह्म , परब्रह्म , पूर्णब्रह्म ) का स्मरण करता हुआ प्राण त्याग कर जाता है तो उसी को प्राप्त होता है ।

प्रश्न : – आपने गीता अध्याय 7 श्लोक 18 के अनुवाद में अर्थ का अनर्थ किया है ” अनुत्तमाम् “ का अर्थ अश्रेष्ठ किया है । जब कि समास में अनुत्तम का अर्थ अति उत्तम होता है जिस से उत्तम कोई और न हो उस के विषय में समास में अनुत्तम का अर्थ अति उत्तम होता है । अन्य गीता अनुवाद कर्ताओं ने सही अर्थ किया है अनुत्तम का अर्थ अति उत्तम किया है ।

उत्तर : – हे भद्र पुरूष ! जैसे उत्तीर्ण का अर्थ पास अर्थात् सफल होता है तथा अनुतीर्ण का अर्थ फेल अर्थात् असफल होता है । यदि कोई कहे कि अनुतीर्ण का अर्थ अति सफल होता है क्या यह बात न्याय संगत है ? अर्थात् नहीं फिर भी मैं आप की इस बात को सत्य मान कर आप से प्रार्थना करता हूँ कि “ गीता ज्ञान दाता अपनी साधना के विषय में गीता अध्याय 7 श्लोक 16 से 18 में बता रहे हैं ।

यदि गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में अपनी साधना व गति को अनुत्तम कह रहे हैं । जिस का भावार्थ आप के समास के अनुसार यह हुआ कि गीता ज्ञान दाता की गति से उत्तम अन्य कोई गति नहीं अर्थात् मोक्ष लाभ नहीं । फिर गीता ज्ञान दाता स्वयं कह रहा है कि उत्तम पुरूषः तू अन्यः अर्थात् सर्व श्रेष्ठ परमात्मा तो कोई अन्य ही है । उसी की उपासना से परम शान्ति तथा पूर्ण मोक्ष सम्भव है । इस से सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता से श्रेष्ठ प्रभु अन्य है उसी की गति ही सर्व श्रेष्ठ सिद्ध हुई ।

इसलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में अनुत्तम का अर्थ सर्व श्रेष्ठ अनुचित सिद्ध हुआ । गीता ज्ञान दाता स्वयं गीता अध्याय 18 श्लोक 62 व अध्याय 15 श्लोक 4 में किसी अन्य परमेश्वर की शरण में जाने को कह रहे हैं । उसी की कृपा से परम शान्ति व शाश्वत स्थान सदा रहने वाला मोक्ष स्थल अर्थात् सत्यलोक प्राप्त होगा । अपने विषय में भी कहा है कि मैं भी उसी की शरण हूँ । उसी पूर्ण परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए तथा कहा है कि उस परमेश्वर के परमपद ( सत्यलोक ) को प्राप्त करना चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक लौटकर इस संसार में कभी नहीं आते अर्थात् उनका जन्म मत्यु सदा के लिए समाप्त हो जाता है ।

अपने से अन्य परमात्मा के विषय में गीता अध्याय 18 श्लोक 46,61-62,64,66 अध्याय 15श्लोक 4,16-17 , अध्याय 13 श्लोक 12 से 17 , 22 से 24 , 27-28,30-31,34 अध्याय 5 श्लोक 6 10,13 से 21 तथा 24-25-26 अध्याय 6 श्लोक 7,19,20,25,26-27 अध्याय 4 श्लोक 31-32 , अध्याय श्लोक 3,8 से 10,17 से 22 , अध्याय 7 श्लोक 19 से 29 , अध्याय 14 श्लोक 19 आदि -2 श्लोकों में कहा है

इससे सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता से श्रेष्ठ अर्थात् उत्तम परमात्मा तो अन्य है जैसे गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि उत्तम पुरुषः तु अन्यः जिसका अर्थ है उत्तम परमात्मा तो अन्य ही है । इसलिए उस उत्तम पुरुष अर्थात् सर्वश्रेष्ठ परमात्मा की गति अर्थात् उस मिलने वाला मोक्ष भी अति उत्तम हुआ । इस से यह सिद्ध हुआ कि उस परमेश्वर अर्थात् पूर्ण परमात्मा की गति गीता ज्ञान दाता वाली गति से उत्तम हुई ।

इसलिए गीता ज्ञान दाता वाली गति सर्व श्रेष्ठ नहीं है । अर्थात् जिस से श्रेष्ठ कोई न हो । यह विशेषण भी गलत सिद्ध हुआ । क्योंकि जब गीता ज्ञान दाता से श्रेष्ठ कोई और परमेश्वर है तो उस की गति भी गीता ज्ञान दाता से श्रेष्ठ है । इससे सिद्ध हुआ कि गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में अनुत्तम का अर्थ अश्रेष्ठ ही न्याय संगत है अर्थात् उचित है । आप तथा अन्य गीता अनुवाद कर्ताओं ने अर्थ का अनर्थ किया है । जो अनुत्तम का अर्थ अति उत्तम कहा तथा किया है ।

गीता अध्याय 7 श्लोक 19 : इस मंत्र में काल ब्रह्म कह रहा है कि मेरी साधना भी कई जन्मों बाद कोई – कोई ही करता है , नहीं तो नीचे के श्री ब्रह्मा जी , श्री विष्णु जी , श्री शिव जी तथा अन्य देवताओं , भूतों व पितरों तक की भक्ति से ऊपर बुद्धि नहीं उठती । परन्तु यह बताने बहुत दुर्लभ है कि पूर्ण परमात्मा ही पूजा के योग्य है । वह सर्व सष्टि रचनहार है । वही सर्व का धारण – पोषण करने वाला सर्वशक्तिमान है , वही वास्तव में वासुदेव है ।

वासुदेव का अर्थ है सर्व का मालिक जैसे श्री ब्रह्मा जी , श्री विष्णु जी , श्री शिव जी एक ब्रह्मण्ड में एक – एक विभाग के मंत्री ( प्रभु ) हैं । रजोगुण विभाग के श्री ब्रह्मा जी , सतोगुण विभाग के श्री विष्णु जी तथा तमोगुण विभाग के श्री शिव जी सर्व के मालिक अर्थात् वासुदेव नहीं हैं ।

ब्रह्म इक्कीस ब्रह्मण्ड में मुख्य मंत्री ( स्वामी ) जानो जो काल के आधीन हैं , सर्व का मालिक अर्थात् वासुदेव नहीं है । ऐसे – ऐसे सात संख ब्रह्मण्ड परब्रह्म ( अक्षर पुरुष ) के हैं , केवल सात संख ब्रह्मण्ड का मालिक , सर्व का मालिक अर्थात् वासुदेव नहीं है तथा असंख ब्रह्मण्ड पूर्णब्रह्म ( परम अक्षर ब्रह्म / सतपुरुष ) के हैं । वास्तव में सर्व का मालिक अर्थात् वासुदेव पूर्णब्रह्म है ।

जैसे उलटे लटके वक्ष की जड़ ( पूर्णब्रह्म ) है जिससे सर्व तना ( अक्षर पुरुष ) डार ( काल – ब्रह्म ) शाखा ( तीनों रजगुण ब्रह्मा , सतगुण – विष्णु , तमगुण – शिवजी ) को भोजन मिलता है । इसलिए सर्व का पालन कर्ता भी पूर्ण ब्रह्म ही हुआ । यह व्याख्या करने वाला संत तो सुदुर्लभ है । उसके मिलने से ही पूर्ण मोक्ष होगा , अन्यथा काल जाल में ही प्राणी फंसे रहेंगे । वाला संत

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