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Saturday, June 19, 2021

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” पवित्र श्रीमद्भगवत गीता जी का ज्ञान किसने कहा?”|Who said the knowledge of Holy Shrimad Bhagwat Geeta ji|

पवित्र गीता जी के ज्ञान को उस समय बोला गया था जब महाभारत का युद्ध होने जा रहा था । अर्जुन ने युद्ध करने से इन्कार कर दिया था । युद्ध क्यों हो रहा था ? इस युद्ध को धर्मयुद्ध की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती क्योंकि दो परिवारों कौरवों तथा पाण्डवों का सम्पत्ति वितरण पर विवाद था ।

कौरवों ने पाण्डवों को आधा राज्य भी देने से मना कर दिया था । दोनों पक्षों का बीच – बचाव करने के लिए प्रभु श्री कष्ण जी तीन बार शान्ति दूत बन कर गए । परन्तु दोनों ही पक्ष अपनी – अपनी जिद्द पर अटल थे ।

श्री कष्ण जी ने युद्ध से होने वाली हानि से भी परिचित कराते हुए कहा कि न जाने कितनी बहन विधवा होंगी ? कितने ही बच्चे अनाथ हो जाएंगे महापाप के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा ।

युद्ध में क्या पता कौन मरे , कौन बचे ? तीसरी बार जब श्री कष्ण जी समझौता करवाने गए तो दोनों पक्षों ने अपने – अपने पक्ष वाले राजाओं की सेना सहित सूची पत्र दिखाया तथा कहा कि इतने राजा हमारे पक्ष में हैं तथा इतने हमारे पक्ष में श्री कष्ण जी ने देखा कि दोनों ही पक्ष टस से मस नहीं हो रहे हैं , युद्ध के लिए तैयार हो चुके हैं । तब श्री कष्ण जी ने सोचा कि एक दाव और है वह भी आज लगा देता हूँ ।

श्री कष्ण जी ने सोचा कि कहीं पाण्डव मेरे सम्बन्धी होने के कारण अपनी जिद्द इसलिए न छोड़ रहे हों कि श्री कष्ण हमारे साथ हैं , विजय हमारी ही होगी ( क्योंकि श्री कष्ण जी की बहन सुभद्रा जी का विवाह श्री अर्जुन जी से हुआ था ) ।

श्री कष्ण जी ने कहा कि एक तरफ मेरी सर्व सेना होगी और दूसरी तरफ मैं होऊँगा और इसके साथ – साथ मैं वचन बद्ध भी होता हूँ कि मैं हथियार भी नहीं उठाऊँगा । इस घोषणा से पाण्डवों के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई । उनको लगा कि अब हमारी पराजय निश्चित है ।

यह विचार कर पाँचों पाण्डव यह कह कर सभा से बाहर गए कि हम कुछ विचार कर लें । कुछ समय उपरान्त श्री कष्ण जी को सभा से बाहर आने की प्रार्थना की ।

श्री कष्ण जी के बाहर आने पर पाण्डवों ने कहा कि हे भगवन् ! हमें पाँच गाँव दिलवा दो हम युद्ध नहीं चाहते हैं । हमारी इज्जत भी रह जाएगी और आप चाहते हैं कि युद्ध न हो , यह भी टल जाएगा ।

पाण्डवों के इस फैसले से श्री कष्ण जी बहुत प्रसन्न हुए तथा सोचा कि बुरा समय टल गया श्री कष्ण जी वापिस आए , सभा में केवल कौरव तथा उनके समर्थक शेष थे ।

श्री कष्ण जी ने कहा दुर्योधन युद्ध टल गया है । मेरी भी यह हार्दिक इच्छा थी । आप पाण्डवों को पाँच गाँव दो , वे कह रहे हैं कि हम युद्ध नहीं चाहते । दुर्योधन ने कहा कि पाण्डवों के लिए सुई की नोक तुल्य भी जमीन नहीं है ।

यदि उन्हें राज्य चाहिए तो युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में आ जाएं इस बात से श्री कष्ण जी ने नाराज होकर कहा कि दुर्योधन तू इंसान नहीं शैतान है ।

कहाँ आधा राज्य और कहाँ पाँच गाँव ? मेरी बात मान ले , पाँच गाँव दे दे । श्री कष्ण से नाराज होकर दुर्योधन ने सभा में उपस्थित योद्धाओं को आज्ञा दी कि श्री कष्ण को पकड़ो तथा कारागार में डाल दो । आज्ञा मिलते ही योद्धाओं ने श्री कष्ण जी को चारों तरफ से घेर लिया ।

श्री कष्ण जी ने अपना विराट रूप दिखाया । जिस कारण सर्व योद्धा और कौरव डर कर कुर्सियों के नीचे घुसगाए तथा शरीर के तेज प्रकाश से आँखें बंद हो गई । श्री कष्ण जी वहाँ से निकल गए । आओ विचार करें : – उपरोक्त विराट रूप दिखाने का प्रमाण संक्षिप्त महाभारत गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित में प्रत्यक्ष है ।

जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पवित्र गीता जी का ज्ञान सुनाते समय अध्याय 11 श्लोक 32 में पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि ‘ अर्जुन मैं बढ़ा हुआ काल हूँ । अब सर्व लोकों को खाने के लिए प्रकट हुआ हूँ । ‘ जरा सोचें कि श्री कष्ण जी तो पहले से ही श्री अर्जुन जी के साथ थे ।

यदि पवित्र गीता जी के ज्ञान को श्री कष्ण जी बोल रहे होते तो यह नहीं कहते कि अब प्रवर्त्त हुआ हूँ । फिर अध्याय 11 श्लोक 21 व 46 में अर्जुन कह रहा है कि भगवन् ! आप तो ऋषियों , देवताओं तथा सिद्धों को भी खा रहे हो , जो आप का ही गुणगान पवित्र वेदों के मंत्रों द्वारा उच्चारण कर रहे हैं तथा अपने जीवन की रक्षा के लिए मंगल कामना कर रहे हैं ।

कुछ आपके दाढ़ों में लटक रहे हैं , कुछ आप के मुख में समा रहे हैं । हे सहस्र बाहु अर्थात् हजार भुजा वाले भगवान ! आप अपने उसी चतुर्भुज रूप में आईये । मैं आपके विकराल रूप को देखकर धीरज नहीं कर पा रहा हूँ । अध्याय 11 श्लोक 47 में पवित्र गीता जी को बोलने वाला प्रभु काल कह रहा है कि ‘ हे अर्जुन यह मेरा वास्तविक काल रूप है , जिसे तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा था । ‘ उपरोक्त विवरण से एक तथ्य तो यह सिद्ध हुआ

कि कौरवों की सभा में विराट रूप श्री कष्ण जी ने दिखाया था तथा यहाँ युद्ध के मैदान में विराट रूप काल ( श्री कष्ण जी के शरीर में प्रेतवत् प्रवेश करके अपना विराट रूप काल ) ने दिखाया था । नहीं तो यह नहीं कहता कि यह विराट रूप तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है ।

क्योंकि श्री कष्ण जी अपना विराट रूप कौरवों की सभा में पहले ही दिखा चुके थे । दूसरी यह बात सिद्ध हुई कि पवित्र गीता जी को बोलने वाला काल ( ब्रह्म – ज्योति निरंजन ) है , न कि श्री कष्ण जी । क्योंकि श्री कष्ण जी ने पहले कभी नहीं कहा कि मैं काल हूँ तथा बाद में कभी नहीं कहा कि मैं काल हूँ ।

 श्री कष्ण जी काल नहीं हो सकते । उनके दर्शन मात्र को दूर - दूर क्षेत्र के स्त्री तथा पुरुष तड़फा करते थे । यही प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 24-25 में हैं जिसमें गीता ज्ञान दाता प्रभु ने कहा है कि बुद्धिहीन जन समुदाय मेरे उस घटिया ( अनुत्तम ) विद्यान को नहीं जानते कि मैं कभी भी मनुष्य की तरह किसी के सामने प्रकट नहीं होता । मैं अपनी योगमाया से छिपा रहता हूँ । 

उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता श्री कष्ण जी नहीं है । क्योंकि श्री कष्ण जी तो सर्व समक्ष साक्षात् थे । श्री कष्ण नहीं कहते कि मैं अपनी योग माया से छिपा रहता हूँ ।

इसलिए गीता जी का ज्ञान श्री कष्ण जी के अन्दर प्रेतवत् प्रवेश करके काल ने बोला था । ” विराट रूप क्या है ?

विराट रूप : आप दिन के समय या चाँदनी रात्री में जब आपके शरीर की छाया छोटी लगभग शरीर जितनी लम्बी हो या कुछ बड़ी हो , उस छाया के सीने वाले स्थान पर दो मिनट तक एक टक देखें , चाहे आँखों से पानी भी क्यों न गिरें । फिर सामने आकाश की तरफ देखें ।

आपको अपना ही विराट रूप दिखाई देगा , जो सफेद रंग का आसमान को छू रहा होगायही प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 24-25 में हैं जिसमें गीता ज्ञान दाता प्रभु ने कहा है कि बुद्धिहीन जन समुदाय मेरे उस घटिया ( अनुत्तम ) विद्यान को नहीं जानते कि मैं कभी भी मनुष्य की तरह किसी के सामने प्रकट नहीं होता ।

मैं अपनी योगमाया से छिपा रहता हूँ । उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता श्री कष्ण जी नहीं है । क्योंकि श्री कष्ण जी तो सर्व समक्ष साक्षात् थे । श्री कष्ण नहीं कहते कि मैं अपनी योग माया से छिपा रहता हूँ । इसलिए गीता जी का ज्ञान श्री कष्ण जी के अन्दर प्रेतवत् प्रवेश करके काल ने बोला था ।

” विराट रूप क्या है ?

” विराट रूप : आप दिन के समय या चाँदनी रात्री में जब आपके शरीर की छाया छोटी लगभग शरीर जितनी लम्बी हो या कुछ बड़ी हो , उस छाया के सीने वाले स्थान पर दो मिनट तक एक टक देखें , चाहे आँखों से पानी भी क्यों न गिरें । फिर सामने आकाश की तरफ देखें ।

आपको अपना ही विराट रूप दिखाई देगा , जो सफेद रंग का आसमान को छू रहा होगा ।प्रत्येक मानव अपना विराट रूप रखता है । परन्तु जिनकी भक्ति शक्ति ज्यादा होती है , उनका उतना ही तेज अधिक होता जाता है । इसी प्रकार श्री कष्ण जी भी पूर्व भक्ति शक्ति से सिद्धि युक्त थे , उन्होंने भी अपनी सिद्धि शक्ति से अपना विराट रूप प्रकट कर दिया , जो काल के तेजोमय शरीर ( विराट ) से कम तेजोमय था ।

तीसरी बात यह सिद्ध हुई कि पवित्र गीता जी बोलने वाला प्रभु काल सहस्रबाहु अर्थात् हजार भुजा युक्त है तथा श्री कष्ण जी तो श्री विष्णु जी के अवतार हैं जो चार भुजा युक्त हैं । श्री विष्णु जी सोलह कला युक्त हैं तथा श्री ज्योति निरंजन काल भगवान एक हजार कला युक्त है ।

जैसे एक बल्ब 60 वाट का होता है , एक बल्ब 100 वाट का होता है , एक बल्ब 1000 वाट का होता है , रोशनी सर्व बल्बों की होती है , परन्तु बहुत अन्तर होता है । ठीक इसी प्रकार दोनों प्रभुओं की शक्ति तथा विराट रूप का तेज भिन्न – भिन्न था ।

इस तत्वज्ञान के प्राप्त होने से पूर्व जो गीता जी के ज्ञान को समझाने वाले महात्मा जी थे , उनसे प्रश्न किया करते थे कि पहले तो भगवान श्री कष्ण जी शान्ति दूत बनकर गए थे तथा कहा था कि युद्ध करना महापाप है ।

जब श्री अर्जुन जी ने स्वयं युद्ध करने से मना करते हुए कहा कि हे देवकी नन्दन मैं युद्ध नहीं करना चाहता हूँ । सामने खड़े स्वजनों व नातियों तथा सैनिकों का होने वाला विनाश देख कर मैंने अटल फैसला कर लिया है कि मुझे तीन लोक का राज्य भी प्राप्त हो तो भी मैं युद्ध नहीं करूंगा ।

मैं तो चाहता हूँ कि मुझ निहत्थे को दुर्योधन आदि तीर से मार डालें , ताकि मेरी मत्यु से युद्ध में होने वाला विनाश बच जाए । हे श्री कष्ण ! मैं युद्ध न करके भिक्षा का अन्न खाकर भी निर्वाह करना उचित समझता हूँ । हे कष्ण ! स्वजनों को मारकर तो पाप को ही प्राप्त होंगे ।

मेरी बुद्धि काम करना बंद कर गई है । आप हमारे गुरु हो , मैं आपका शिष्य हूँ । आप जो हमारे हित में हो वही दीजिए । परन्तु मैं नहीं मानता हूँ कि आपकी कोई भी राय मुझे युद्ध के लिए राजी कर पायेगी अर्थात् मैं युद्ध नहीं करूँगा ।

( प्रमाण पवित्र गीता जी अध्याय 1 श्लोक 31 से 39 , 46 तथा अध्याय 2 श्लोक 5 से 8 ) श्री कष्ण जी में प्रवेश काल बार – बार कह रहे हैं कि अर्जुन कायर मत बन , युद्ध कर । या तो में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा , या युद्ध जीत कर पथ्वी के राज्य को भोगेगा , आदि – आदि कह कर ऐसा भयंकर विनाश करवा डाला जो आज तक के संत – महात्माओं तथा सभ्य लोगों के चरित्र में ढूंढने से भी नहीं मिलता है ।

तब वे नादान गुरु जी ( नीम – हकीम ) कहा करते थे कि अर्जुन क्षत्री धर्म को त्याग रहा था । इससे क्षत्रित्व को हानि तथा शूरवीरता का सदा के लिए विनाश हो जाता ।

अर्जुन को क्षत्री धर्म पालन करवाने के लिए यह महाभारत का युद्ध श्री कष्ण जी ने करवाया था । पहले तो मैं उनकी इस नादानों वाली कहानी से चुप हो जाता था , क्योंकि मुझे स्वयं ज्ञान नहीं था । पुनर् विचार करें : – भगवान श्री कष्ण जी स्वयं क्षत्री थे ।

कंस के वध के उपरान्त श्री अग्रसैन जी ने मथुरा की बाग – डोर अपने दोहते श्री कष्ण जी को संभलवा दी थी । एक दिन नारद जी ने श्री कष्ण जी को बताया कि निकट ही एक गुफा में एक सिद्धि युक्त राजा मुचकन्द सोया पड़ा है । वह छ : महीने सोता है तथा छ : महीने जागता है ।

जागने पर छ : महीने युद्ध करता हैवास्तविकता यह है कि काल भगवान जो इक्कीस ब्रह्मण्ड का प्रभु है , उसने प्रतिज्ञा की है कि मैं वास्तविक शरीर में व्यक्त ( मानव सदश अपने वास्तविक ) रूप में सबके सामने नहीं आऊँगा । उसी ने सूक्ष्म शरीर बना कर प्रेत की तरह श्री कष्ण जी के शरीर में प्रवेश करके पवित्र गीता जी का ज्ञान तो सही ( वेदों का सार ) कहा , परन्तु युद्ध करवाने के लिए भी अटकल बाजी में कसर नहीं छोड़ी ।

( काल ब्रह्म ) कौन है ? यह जानने के लिए कप्या पढ़िए सष्टि रचना इसी पुस्तक के पष्ठ नं . 84 से 159 पर ।

जब तक महाभारत का युद्ध समाप्त नहीं हुआ तब तक ज्योति निरंजन ( काल ब्रह्म अर्थात् क्षर पुरुष ) श्री कष्ण जी के शरीर में प्रविष्ट रहा तथा युधिष्ठिर जी से झूठ बुलवाया कि कह दो कि अश्वत्थामा मर गया , भीम के पौत्र अर्थात् घटोतकच्छ के पुत्र ( श्याम जी ) का शीश कटवाया तथा रथ के पहिए को हथियार रूप में उठाया , यह सर्व काल ही का किया – कराया उपद्रव था , प्रभु श्री कष्ण जी का नहीं ।

महाभारत का युद्ध समाप्त होते ही काल भगवान श्री कष्ण जी के शरीर से निकल गया । श्री कष्ण जी ने श्री युधिष्ठिर जी को इन्द्रप्रस्थ ( दिल्ली ) की राजगद्दी पर बैठाकर द्वारिका जाने को कहा ।

तब अर्जुन आदि ने प्रार्थना की कि हे श्री कष्ण जी ! आप हमारे पूज्य गुरुदेव हो , हमें एक सतसंग सुना कर जाना , ताकि हम आपके सद्वचनों पर चल कर अपना आत्म – कल्याण कर सकें ।

यह प्रार्थना स्वीकार करके श्री कष्ण जी ने तिथि , समय तथा स्थान निहित कर दिया । निश्चित तिथि को श्री अर्जुन ने भगवान श्री कष्ण जी से कहा कि प्रभु आज वही पवित्र गीता जी का ज्ञान ज्यों का त्यों सुनाना , क्योंकि मैं बुद्धि के दोष से भूल गया हूँ ।

तब श्री कष्ण जी ने कहा कि हे अर्जुन तू निश्चय ही बड़ा श्रद्धाहीन है । तेरी बुद्धि अच्छी नहीं है । ऐसे पवित्र ज्ञान को तूं क्यों भूल गया ? फिर स्वयं कहा कि अब उस पूरे गीता ज्ञान को मैं नहीं कह सकता अर्थात् मुझे ज्ञान नहीं । कहा कि उस समय तो मैंने योग युक्त होकर बोला था ।

विचारणीय विषय है कि यदि भगवान श्री कष्ण जी युद्ध के समय योग युक्त हुए होते तो शान्ति समय में योग युक्त होना कठिन नहीं था । जबकि श्री व्यास जी ने वही पवित्र गीता जी का ज्ञान वर्षों उपरान्त ज्यों का त्यों लिपिबद्ध कर दिया ।

उस समय काल ब्रह्म ( ज्योति निरंजन ) ने श्री व्यास जी के शरीर में प्रवेश कर के पवित्र श्रीमद्भगवत गीता जी को लिपिबद्ध कराया , जो वर्तमान में आप के कर कमलों में है । प्रमाण के लिए संक्षिप्त महाभारत पष्ठ नं . 667 तथा पुराने के पष्ठ नं . 1531 पर : न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः ।। परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया । ( महाभारत , आश्रवः 1612-13 ) भगवान बोले – ‘ वह सब – का – सब उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात नहीं है । उस समय मैंने योगयुक्त होकर परमात्मतत्वका वर्णन किया था ।

‘ संक्षिप्त महाभारत द्वितीय भाग के8 पवित्र श्रीमद्भगवत गीता जी का ज्ञान किसने कहा पष्ठ नं . 1531 से सहाभार : ( ‘ श्रीकष्णका अर्जुनसे गीता का विषय पूछना सिद्ध महर्षि वैशम्पायन और काश्यपका संवाद ‘ ) – पाण्डुनन्दन अर्जुन श्रीकष्णके साथ रहकर बहुत प्रसन्न थे । उन्होंने एक बार उस रमणीय सभाकी ओर दष्टि डालकर भगवान्से यह वचन कहा — ‘ देवकीनन्दन ! जब युद्धका अवसर उपस्थित था , उस समय मुझे आपके माहात्म्यका ज्ञान और ईश्वरीय स्वरूपका दर्शन हुआ था , किंतु केशव ! आपने स्नेहवश पहले मुझे जो ज्ञानका उपदेश किया था , वह सब इस समय बुद्धि के दोषसे भूल गया हूँ ।

उन विषयों को सुनने के लिये बारंबार मेरे मनमें उत्कण्ठा होती है , इधर , आप जल्दी ही द्वारका जानेवाले हैं । अतः पुनः वह सब विषय मुझे सुना दीजिये ।

वैशम्पायनजी कहते हैं –अर्जुनके ऐसा कहनेपर वक्ताओं में श्रेष्ठ महातेजस्वी भगवान् श्रीकष्णने उन्हें गलेसे लगाकर इस प्रकार उत्तर दिया ।

श्रीकष्ण बोले — अर्जुन ! उस समय मैंने तुम्हें अत्यन्त गोपनीय विषयका श्रवण कराया था , अपने स्वरूपभूत धर्म सनातन पुरुषोत्तमतत्त्वका परिचय दिया था और ( शुक्ल – कष्ण गतिका निरूपण करते हुए ) नित्य लोकों का भी वर्णन किया था । किंतु तुमने जो अपनी नासमझीके कारण उस उपदेशको याद नहीं रक्खा यह जानकर मुझे बड़ा खेद हुआ है । उन बातोंका अब पूरा – पूरा स्मरण होना सम्भव नहीं जान पड़ता । पाण्डुनन्दन ! निश्चय ही तुम बड़े श्रद्धाहीन हो , तुम्हारी बुद्धि अच्छी नहीं जान पड़ती । अब मेरे लिये उस उपदेशको ज्यों – का – त्यों दुहरा देना कठिन है , क्योंकि उस समय योगयुक्त होकर मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था ।

( अधिक जानकारी के लिए पढ़ें – ‘ संक्षिप्त महाभारत द्वितीय भाग ) विचार करें : – उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि श्री कष्ण जी ने श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान नहीं बोला , यह तो काल ( ज्योति निरंजन अर्थात् ब्रह्म ) ने बोला था ।

अन्य प्रमाण : – ( 1 ) कुछ समय उपरान्त श्री युधिष्ठिर जी को भयंकर स्वपन आने लगे । श्री कष्ण जी से कारण तथा समाधान पूछा तो बताया कि तुमने युद्ध में जो पाप किए हैं वह नर संहार का दोष तुम्हें दुःख दाई हो रहा है । इसके लिए एक यज्ञ करो ।

श्री कष्ण जी के मुख कमल से यह वचन सुन कर श्री अर्जुन को बहुत दुःख हुआ तथा मन ही मन विचार करने लगा कि भगवान श्री कष्ण जी पवित्र गीता बोलते समय तो कह रहे थे कि अर्जुन तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा , तूं युद्ध कर ले ( पवित्र गीता अध्याय 2 श्लोक 37-38 ) । यदि युद्ध में मारा भी गया तो स्वर्ग का सुख भोगेगा , अन्यथा युद्ध में जीत कर पथ्वी के राज्य का आनन्द लेगा , तुम्हारे दोनों हाथों में लड्डू हैं । अर्जुन ने विचार किया कि जो समाधान दुःख निवारण का श्री कष्ण जी ने बताया है इसमें करोड़ों रूपया व्यय होना है ।

जिससे बड़े भाई युधिष्ठिर का कष्ट निवारण होगा । यदि मैं श्री कष्ण जी से वाद – विवाद करूंगा कि आप पवित्र गीता जी का ज्ञान देते समय तो कह रहे थे कि तुम्हें पाप नहीं लगेगा । अब उसके विपरित कह रहे हो । इससे मेरा बड़ा भाई यह न सोच बैठे कि करोड़ों रूपये के खर्च को देख कर अर्जुन बौखला गया है तथा मेरे कष्ट निवार्ण से प्रसन्न नहीं है । इसलिए मौन रहना उचित जान कर सहर्ष स्वीकति दे दी तथा कहा कि हे भगवन् जैसा आप कहोगे वैसा ही होगा ।

श्री कष्ण जी ने उस यज्ञ की तिथि निर्धारित कर दी । वह यज्ञ भी श्री सुदर्शन स्वपच के भोजन खाने से सफल हुई । कुछ समय उपरान्त ऋषि दुर्वासा जी के शापवश सर्व यादव कुल का विनाश हो गया , श्री कष्ण भगवान के पैर के तलुवे में एक शिकारी ( जो त्रेतायुग में सुग्रीव के भाई बाली की ही आत्मा थी ) ने विषाक्त तीर मार दिया ।

तब पाँचों पाण्डवों के घटना स्थल पर पहुँच जाने के उपरान्तश्री कष्ण जी ने कहा कि आप मेरे शिष्य हो मैं आप का धार्मिक गुरु भी हूँ । इसलिए मेरी अन्तिम आज्ञा सुनो । एक तो यह है कि अर्जुन , द्वारिका की सर्व स्त्रियों को इन्द्रप्रस्थ ( दिल्ली ) ले जाना , क्योंकि यहाँ कोई नर नहीं बचा है तथा दूसरे आप सर्व पाण्डव राज्य त्याग कर हिमालय में साधना करके शरीर को गला देना ।

क्योंकि तुमने महाभारत के युद्ध के दौरान जो हत्याएं की थी , तुम्हारे शीश पर वह पाप बहुत भयंकर है । उस समय अर्जुन अपने आप को नहीं रोक सका तथा कहा प्रभु वैसे तो आप ऐसी स्थिति में हैं कि मुझे ऐसी बातें नहीं करनी चाहिऐं , परन्तु प्रभु यदि आज मेरी शंका का समाधान नहीं हुआ तो मैं चैन से मर भी नहीं पाऊँगा । पूरा जीवन रोता रहूँगा । श्री कष्ण जी ने कहा अर्जुन पूछ ले जो कुछ पूछना है , मेरा अन्तिम समय है ।

श्री अर्जुन ने आँखों में आंसू भर कर कहा कि प्रभु बुरा न मानना । जब आपने पवित्र गीता जी का ज्ञान कहा था उस समय मैं युद्ध करने से मना कर रहा था । आपने कहा था कि अर्जुन तेरे दोनों हाथों में लड्डू हैं । यदि युद्ध में मारा गया तो स्वर्ग को प्राप्त होगा और यदि विजयी हुआ तो पथ्वी का राज्य भोगेगा तथा तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा । हमने आप ही की देख – रेख व आज्ञानुसार युद्ध किया ( प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 2 श्लोक 37-38 ) । हे भगवन् ! हमारे तो एक हाथ में भी लड्डू नहीं रहा । न तो युद्ध में मर कर स्वर्ग प्राप्ति हुई तथा अब राज्य त्यागने का आदेश आप दे रहे हैं , न ही पथ्वी के राज्य का आनन्द ही भोग पाए । ऐसा छल युक्त व्यवहार करने में आपका क्या हित था ? अर्जुन के मुख से यह वचन सुन कर युधिष्ठिर जी ने कहा कि अर्जुन ऐसी स्थिति में जब कि भगवान अन्तिम स्वांस गिन रहे हैं आपका शिष्टाचार रहित व्यवहार शोभा नहीं देता । श्री कष्ण जी ने कहा अर्जुन आज मैं अन्तिम स्थिति में हूँ , तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो , आज वास्तविकता बताता हूँ कि कोई खलनायक जैसी और शक्ति है जो अपने को यन्त्र की तरह नचाती रही , मुझे कुछ मालूम नहीं मैंने गीता में क्या बोला था । परन्तु अब मैं जो कह रहा हूँ वह तुम्हारे हित में है । श्री कष्ण जी यह वचन अश्रुयुक्त नेत्रों से कह कर प्राण त्याग गए ।

उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि पवित्र गीता जी का ज्ञान श्री कष्ण जी ने नहीं कहा । यह तो काल ब्रह्म ( ज्योति निरंजन ) ने बोला था , जो इक्कीश ब्रह्मण्ड का स्वामी है । काल ब्रह्म कौन है ? यह जानने के लिए कप्या सष्टि रचना पढ़े । इसी पुस्तक के पष्ठ 84 से 159 पर । श्री कष्ण सहित सर्व यादवों का अन्तिम संस्कार कर अर्जुन को छोड़ कर चारों भाई इन्द्रप्रस्थ ( दिल्ली ) चले गए । पीछे से अर्जुन द्वारिका की स्त्रियों को लिए आ रहा था । रास्ते में जंगली लोगों ने सर्व गोपियों को लूटा तथा कुछेक को भगा ले गए तथा अर्जुन को पकड़ कर पीटा । अर्जुन के हाथ में वही गांडीव धनुष था जिससे महाभारत के युद्ध में अनगिन हत्याएं कर डाली थी , वह भी नहीं चला । तब अर्जुन ने कहा कि यह श्री कष्ण वास्तव में झूठा तथा कपटी था । जब युद्ध में पाप करवाना था तब तो मुझे शक्ति प्रदान कर दी , एक तीर से सैकड़ों योद्धाओं को मार गिराता था और आज वह शक्ति छीन ली , खड़ा – खड़ा पिट रहा हूँ । इसी विषय में पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब ( कविर्देव ) जी का कहना है कि श्री कष्ण जी कपटी व झूठे नहीं थे । यह सर्व छल काल ब्रह्म ( ज्योति निरंजन ) कर रहा है । जब तक यह आत्मा कबीर परमेश्वर ( सतपुरुष ) की शरण में पूरे सन्त ( तत्वदशी ) के माध्यम से नहीं आ जाएगी , तब तक काल इसी तरह कष्ट पर कष्ट देता रहेगा

काल की परिभाषा(definition of Devil)

पूर्ण जानकारी तत्वज्ञान से होती है । अन्य प्रमाण : ( 2 ) गीता अध्याय 10 श्लोक 9 से 11 में गीता ज्ञान दाता काल प्रभु कह रहा है कि जो श्रद्धालु मुझ ब्रह्म का ही निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं उनके अज्ञान को नष्ट करने के लिए मैं ही उनके अन्दर ( आत्मभावस्थः ) जीवात्मा की तरह बैठकर शास्त्रों का ज्ञान देता हूँ ।

( 3 ) श्री विष्णु पुराण ( गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित ) के चतुर्थ अंश अध्याय 2 श्लोक 21 से 26 में पष्ठ 233 पर लिखा है कि देवताओं और राक्षसों के युद्ध में देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने कहा है कि मैं राजर्षि शशाद के शरीर में कुछ समय प्रवेश करके असुरों का नाश करूंगा । ( यहाँ पर विष्णु रूप में काल ब्रह्म बोल रहा है )

( 4 ) श्री विष्णु पुराण ( गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित ) के चतुर्थ अंश अध्याय 3 श्लोक 4 से 6 में पष्ठ 242 पर लिखा है कि ” नागेश्वरों की प्रार्थना स्वीकार करके श्री विष्णु जी ने कहा कि मैं मानधाता के पुत्र पुरुकुत्स के शरीर में प्रवेश करके गन्धों का नाश करूंगा । { यहाँ पर विष्णु रूप में काल ब्रह्म बोल रहा है }

विशेष विचार : – उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान श्री कष्ण ने नहीं बोला , यह तो श्री कष्ण जी के शरीर में प्रेतवत प्रवेश होकर काल ब्रह्म ( ज्योति निरंजन ) ने बोला था । क्योंकि वह उपरोक्त नियम से किसी भी योग्य व्यक्ति में प्रेतवत् प्रवेश करके अपना कार्य सिद्ध करता है । पश्चात् निकल जाता है जैसे अर्जुन में प्रवेश करके विरोधी सेना मार डाली पश्चात् निकल गया । फिर अर्जुन को जंगली व्यक्तियों ने मारा – पीटा । अर्जुन में पूर्व वाली शक्ति नहीं रही ।

” काल की परिभाषा “ पवित्र विष्णु पुराण में वर्णन है कि भगवान विष्णु ( महाविष्णु रूप में काल ) का प्रथम रूप तो पुरुष ( प्रभु जैसा ) है परन्तु उसका परम रूप ‘ काल ‘ है । जब भगवान विष्णु ( काल जो महाविष्णु रूप में ब्रह्मलोक में रहता है तथा प्रकति अर्थात् दुर्गा को अपनी पत्नी महालक्ष्मी रूप में रखता है ) अपनी प्रकति ( दुगा ) से अलग हो जाता है तो काल रूप में प्रकट हो जाता है ।

( विष्णु पुराण अध्याय 2 श्लोक 14 व 27 पष्ठ 4-5 गीता प्रैस गोरख पुर से प्रकाशित , अनुवादक हैं श्री मुनिलाल गुप्त ) विशेष : – उपरोक्त विवरण का भावार्थ है कि यह महाविष्णु अर्थात् काल पुरुष पहले तो लगता है कि यह दयावान भगवान है । जैसे खाने के लिए अन्न , मेवा व फल आदि कितने स्वादिष्ट प्रदान किए हैं तथा पीने के लिए दूध , जल कितने स्वादिष्ट तथा प्राण दायक प्रदान किए हैं ।

कितनी अच्छी वायु जीने के लिए चला रखी है , कितनी विस्तत पथ्वी रहने तथा घूमने के लिए प्रदान की है , फिर पति – पत्नी का योग , पुत्रों व पुत्रियों की प्राप्ति से लगता है कि यह तो बड़ा दयावान प्रभु है । जिसके लोक में हम रह रहे हैं ।

महाविष्णु का वास्तविक रूप काल कैसे है : – किसी के पुत्र की मत्यु , किसी की पुत्री की मत्यु , किसी के दोनों पुत्रों की मत्यु , किसी का पूरा परिवार दुर्घटना में मत्यु को प्राप्त हो जाता है । किसी क्षेत्र में बाढ़ आकर हजारों व्यक्तियों की परिवार सहित मत्यु , किसी क्षेत्र में भूकंप से लाखों व्यक्ति सपरिवार मत्यु को प्राप्त हो जाते हैं ।

इस प्रकार इस विष्णु ( महाविष्णु रूप में ज्योति निरंजन ) का वास्तविक रूप काल है । क्योंकि ज्योति निरंजन ( काल ) शाप वश एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों का आहार करता है ।

इसलिए अपने तीनों पुत्रों ( रजगुण ब्रह्मा जी , सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी ) से उत्पत्ति , स्थिति व संहार करवाता है ।

उदाहरण : – पूर्ण ब्रह्म कविर्देव ने अपने प्रिय सेवक श्री धर्मदास जी द्वारा काल की स्थिति पूछने पर बताया कि जैसे कसाई बकरे पालता है । उन प्राणियों के चारे की व्यवस्था करता है , पानी का प्रबन्ध करता है , गर्मी व सर्दी से बचने के लिए कुछ मकान आदि का भी प्रबन्ध करता है , जिससे वे अबोध बकरे समझते हैं कि हमारा स्वामी बहुत दयालु है ।

हमारा कितना ध्यान रखता है । जब कसाई उनके पास आता है तो वे नर व मादा बकरे उसे अपना सुखदाई मालिक जान कर उसको प्यार जताने के लिए आगे वाले पैर उठाकर कसाई के शरीर को स्पर्श करते हैं , कुछ उसके हाथों व पैरों को चाटते हैं । कसाई उन बकरों को छूकर कमर पर हाथ लगा कर दबा – दबा कर देखता है तो वे बकरे समझते हैं कि हमें प्यार दे रहा है ।

परन्तु कसाई देख रहा होता है कि इस बकरे में कितने किलोग्राम मास हो चुका है । जब मांस लेने के लिए ग्राहक आता है तो उस समय कसाई नहीं देखता कि किसका बाप मर रहा है , किसकी बेटी या पुत्र या सर्व परिवार मर रहा है । उनको सुविधा देने का उसका यही उद्देश्य था ।

ठीक इसी प्रकार सर्व प्राणी काल ब्रह्म की साधना करके काल आहार ही बने हैं । इससे छूटने की विधि आपको इसी पुस्तक में विस्तत मिलेगी ।

एक बहन ने मुझ दास का सतसंग सुना तथा बाद में अपनी दुःख भरी कथा सुनाई

उस बहन ने कहा महाराज जी मैं विधवा हूँ । एक पुत्र की प्राप्ति होते ही मेरे पति की मत्यु हो गई । मैंने अपने पुत्र की परवरिश बहुत ही चाव तथा प्यार के साथ इस दष्टि कोण से की कि कहीं पुत्र को पिता का अभाव महसूस न हो जाए ।

उसने जो सम्भव वस्तु की प्रार्थना की मैंने दुःखी सुखी होकर उपलब्ध करवाई । जब वह ग्यारहवीं कक्षा में कॉलेज में जाने लगा तो मोटर साईकिल की जिद कर ली ।

दुर्घटना के भय से मैंने बहुत मना किया , परन्तु पुत्र ने खाना नहीं खाया । तब मैंने उसके प्यारवश होकर मोटर साईकिल जैसे – तैसे करके मोल लेकर दे दी ।

मैंने दूसरी शादी भी इसी उद्देश्य से नहीं करवाई की कि कहीं मेरे पुत्र को कष्ट न हो जाए । मैंने अपने पुत्र को गर्म – गर्म खाना खिलाया ।

वह प्रतिदिन की तरह अपने एक दोस्त को उसके घर से मोटर साईकिल पर बैठाकर कॉलेज जाने के लिए चला गया । मैंने शेष भोजन बनाया तथा स्वयं खाने के लिए भोजन डाल कर प्रथम ग्रास ही तोड़ा था इतने में मेरे पुत्र का दोस्त दौड़ता हुआ आया , उसको कुछ चोट लगी हुई थी ।

उसने कहा कि चाची भईया को दुर्घटना में बहुत ज्यादा चोट आई है । इतना सुनते ही हाथ का ग्रास थाली मेंगिर गया । नंगे पैरों उस बच्चे के साथ पागलों की तरह रोती हुई दौड़ कर उस स्थान पर गई जहाँ मेरे पुत्र की दुर्घटना हुई थी ।

वहाँ पर केवल क्षति ग्रस्त मोटर साईकिल पड़ी थी । उपस्थित व्यक्तियों ने बताया कि आपके पुत्र को हस्पताल लेकर गये हैं । मैं हस्पताल पहुंची तो डाक्टरों ने मत घोषित कर दिया । मैंने हस्पताल की दीवार को टक्कर मारी , मेरा सिर फट गया , सात टांके लगे , बेहोश हो गई , लगभग दो घंटे में होश आया ।

उस दिन के बाद सर्व भगवानों के चित्र घर से बाहर फेंक दिए तथा स्वपन में भी किसी भगवान को याद नहीं करती । क्योंकि मैंने अपने पुत्र की कुशलता के लिए लोकवेद अनुसार सर्व साधनाएं की , परन्तु कुछ भी काम नहीं आई ।

आज आप का सतसंग जो सष्टि रचना का प्रकरण आपने सुनाया तथा पवित्र गीता जी से भी बताया कि यह सर्व काल का जाल है , अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कसाई की तरह सर्व प्राणियों को विवश किए हुए है ।

मेरी तो आज आंखें खुल गई । अब मन करता है कि आपका उपदेश लेकर काल जाल से निकल जाऊं । उस बहन ने उपदेश लिया तथा अपना कल्याण करवाया । मैंने उस बहन से पूछा आप क्या साधना करते थे ?

उस बहन ने उत्तर दिया : – एक सुप्रसिद्ध संत का नाम लेकर कहा कि उस मूर्ख से दस वर्ष से उपदेश भी ले रखा था । उसके बताए अनुसार नाम जाप घण्टों किया करती थी । श्री विष्णु जी का सहस्रनामा का जाप भी करती थी । गीता जी का नित्य पाठ , पितर पूजा ( श्राद्ध निकालना ) करती थी ।

गांव में परम्परागत बाबा श्याम जी की पूजा भी करती थी । अष्टमी तथा सोमवार का व्रत भी करती थी । निकटतम मन्दिर में प्रतिदिन जाती थी । वर्ष में दो बार वैष्णों देवी के दर्शन करने जाती थी । गुड़गांव वाली माता की पूजा भी करती थी । नवरात्रों का व्रत भी किया करती थी ।

एक बहन ने कहा बाबा गरीबदास जी की पूजा करने तथा वहाँ छुड़ानी धाम ( जिला झज्जर ) पर जाने से कोई आपत्ति नहीं आ सकती । वहाँ भी छठे महीने मेला भरता है जाया करती थी तथा पाठ भी करवाती थी । और क्या बताऊँ ? बाबा हरिदास जी झाडौदा वाले की भी पूजा करती थी ।

मुझे कोई लाभ नहीं हुआ । पहले तो लगता था कि मेरा परिवार सुखी है । जो उपरोक्त साधना का ही परिणाम है । परन्तु अब आप के सतसंग से ज्ञान हुआ कि यह तो मेरा प्रारब्ध ही मिल रहा था ।

ये पूजाऐं पवित्र गीता जी में तथा पवित्र अमत वाणी परमेश्वर कबीर जी तथा गरीबदास जी के सद्ग्रन्थ में वर्णित न होने से शास्त्र विरुद्ध थी । जिस कारण से कोई लाभ होना ही नहीं था । हमारा क्या दोष है ? जो गुरु जी ने साधना बताई मैं तो तन – मन – धन से कर रही थी ।

अब पता चला कि वे गुरु नहीं है , वे तो नीम हकीम हैं । मानव जीवन के सब से बड़े शत्रु हैं । यदि मुझे यह सत्य साधना मिल जाती तो मेरा पुत्र नहीं मरता । क्योंकि मैंने आपके सेवकों के सुखों को देखा है तथा उन पर आने वाली भयंकर आपतियों को टलते देखा है ।

तब मैं आपका सतसंग सुनने आई तथा आप का लगातार चार दिन तक सतसंग सुनकर आज उपदेश लेने की इच्छा हुई है । मैंने उस बहन से कहा कि जिन साधनाओं को आप कर रही थी वे सर्व शास्त्र विधि अनुसार नहीं थी , जिस कारण आपको परमेश्वर का सहयोग प्राप्त नहीं हुआ ।

यह तो आप ने स्वयं हीनिर्णय लेकर बता दिया । क्योंकि आज तक आपको सत्संग ही प्राप्त नहीं हुआ था । जिसे आप सतसंग जान कर श्रवण करती थी वह सतसंग नहीं लोक वेद ( सुना सुनाया शास्त्र विरुद्ध ज्ञान ) था । जो आप किसी धाम पर जाती थी तथा पाठ करवाती थी ।

आदरणीय गरीबदास जी की पूजा करती थी । जब कि आदरणीय गरीबदास जी तो कहते हैं कि : सब पदवी के मूल हैं , सकल सिद्ध हैं तीर । दास गरीब सतपुरुष भजो , अविगत कला कबीर ।। अलल पंख अनुराग है , सुन्न मण्डल रहे थीर । दास गरीब उधारिया , सतगुरु मिलें कबीर ।।

पूजें देई धाम को , शीश हलावें जो । गरीबदास साची कहैं , हद काफिर हैं सो । उपरोक्त अमतवाणी में प्रमाण है कि आदरणीय गरीबदास साहेब जी कह रहे हैं कि मेरा उद्धार भी परमेश्वर कबीर ( कविर्देव ) ने किया तथा तुम भी उसी सर्वशक्तिमान कबीर ( कविरमितौजा ) परमेश्वर की ही भक्ति करो ।

उसके लिए कहा है कि पूर्ण संत जो कबीर परमेश्वर ( कविर्देव ) का कपा पात्र हो , उससे उपदेश लेकर अपना कल्याण करवाओ । झूठे गुरुओं के आश्रित रहने से जीवन व्यर्थ होता है । उस शास्त्र विरुद्ध साधना बताने वाले नकली गुरु को त्याग देना चाहिये । उसके तो दर्शन भी अशुभ होते हैं ।

आदरणीय गरीबदास साहेब जी अपनी अमतवाणी में कहते हैं कि : झूठे गुरु को लीतर लावें , उसको निश्चय पीटे । उसके पीटे पाप नहीं है , घर से काढ़ घसीटे ।। उपरोक्त अमतवाणी में आदरणीय गरीबदास साहेब जी शास्त्र विधि रहित साधना बता कर अनमोल मानव जन्म को नष्ट करने वाले नकली ( झूठे ) मार्ग दर्शकों ( गुरुओं ) के विषय में कह रहे हैं कि वे आप का जीवन नष्ट करने वाले हैं ।

उनसे तुरंत छुटकारा लेना चाहिये । घर में घुसने नहीं देना चाहिए । वे तो परमेश्वर कबीर ( कविर्देव ) के द्रोही हैं तथा काल के भेजे दूत हैं

adhik jankari kai liye yha visit kre

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